Book 18/2026
सच्ची प्रगतिशीलता का मुखौटा और आज का समाज: क्यों आज भी प्रासंगिक है प्रेमचंद की 'प्रतिज्ञा'
स्कूल के दिनों से ही जब भी मैं प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, रवींद्रनाथ टैगोर और शरतचंद्र जैसे कालजयी लेखकों को पढ़ता था, तो उनकी लेखनी और किरदारों की गहराई मेरे दिलो-दिमाग पर एक अमिट छाप छोड़ जाती थी। चाहे टैगोर का 'गोरा' हो, शरतचंद्र का कोई उपन्यास हो, या फिर प्रेमचंद का 'गोदान', 'रंगभूमि', 'कफ़न' और 'निर्मला'—इन कहानियों के पात्रों में मैंने हमेशा खुद को कहीं न कहीं जुड़ा हुआ पाया। बचपन की वह साहित्यिक रुचि समय के साथ थोड़ी पीछे छूट गई थी, लेकिन हाल ही में जब मैंने ऑडिबल (Audible) पर इन कहानियों को दोबारा सुनना शुरू किया, तो वे पुरानी यादें फिर से ताज़ा हो गईं।
इसी सिलसिले में जब मैंने प्रेमचंद के उपन्यास 'प्रतिज्ञा' को दोबारा सुना, तो मैं दंग रह गया। मुझे यह उपन्यास उनके ही एक अन्य प्रसिद्ध उपन्यास 'निर्मला' से काफी जुड़ा हुआ महसूस हुआ, जहाँ नारी जीवन की विवशताओं को बहुत गहराई से उकेरा गया है। आज जब मैं एक परिपक्व नज़रिए से 'प्रतिज्ञा' के किरदारों का विश्लेषण करता हूँ, तो मुझे अहसास होता है कि ये सिर्फ एक सदी पुराने पन्नों के चरित्र नहीं हैं; बल्कि आज भी हमारे आस-पास जीते-जागते कई लोग बिल्कुल इन्हीं किरदारों जैसे हैं। आज के तथाकथित आधुनिक समाज में भी एक अकेली महिला (चाहे वह विधवा हो, तलाकशुदा हो, या सिंगल मदर हो) का जीवन कितना कठिन है, यह बात इस उपन्यास के पात्रों को देखकर साफ समझ आती है।
'प्रतिज्ञा' के पात्रों का गहन विश्लेषण और मेरा आत्म-मूल्यांकन
१. कमलाप्रसाद: छद्म-प्रगतिशीलता का आधुनिक चेहरा
कमलाप्रसाद उपन्यास का वह नकारात्मक पात्र है जो अपनी वासना और स्वार्थ को छिपाने के लिए 'गांधर्व विवाह', 'ईश्वरीय इच्छा' और 'प्रेम की स्वतंत्रता' जैसे ऊंचे दार्शनिक तर्कों का सहारा लेता है। उसका असल मकसद एक बेसहारा महिला की लाचारी का फायदा उठाना है।
- इस पात्र ने मुझे कैसे प्रभावित किया: कमलाप्रसाद के चरित्र ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि आज के दौर में हमारे आस-पास ऐसे लोगों की संख्या बहुत बढ़ गई है। आज का आधुनिक पुरुष सोशल मीडिया पर महिला सशक्तिकरण और रूढ़ियों को तोड़ने की बड़ी-बड़ी बातें आसानी से कर लेता है। लेकिन जब उसके सामने वास्तव में कोई अकेली, संकट में फंसी या भावनात्मक रूप से टूटी हुई महिला आती है, तो वह उसे सहारा देने के बहाने उसकी मजबूरी को एक 'अवसर' (Opportunity) की तरह देखने लगता है। इस पात्र को देखकर मैंने समझा कि किसी की मदद करते समय अपनी नीयत को पूरी तरह साफ़, निस्वार्थ और किसी भी गुप्त एजेंडे से मुक्त रखना ही सच्ची इंसानियत है।
२. अमृतराय: आदर्श और सच्ची सहानुभूति के प्रतीक
अमृतराय उपन्यास के नायक हैं जो एक विधुर हैं। वे समाज सुधार के लिए एक विधवा से विवाह करने की दृढ़ प्रतिज्ञा लेते हैं। वे केवल बातें नहीं करते, बल्कि रूढ़िवादी समाज और अपने करीबियों के भारी विरोध के बावजूद अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हैं।
- इस पात्र ने मुझे कैसे प्रभावित किया: अमृतराय ने मुझे सिखाया कि समाज को बदलने के लिए सबसे पहले खुद को दांव पर लगाना पड़ता है। आज के दौर में जहाँ लोग दूसरों की मुसीबत देखकर केवल तमाशा देखते हैं, वहाँ अमृतराय जैसा चरित्र हमें सिखाता है कि किसी कमज़ोर व्यक्ति के साथ बिना किसी स्वार्थ के खड़े होना क्या होता है। उनका चरित्र मुझे एक ऐसा इंसान बनने की प्रेरणा देता है जो किसी असहाय व्यक्ति को समाज से डराने के बजाय उसे अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद करे।
३. पूर्णा: विवशता, संघर्ष और आत्मसम्मान की आवाज़
पूर्णा एक अनाथ और बेसहारा विधवा है जो समाज की क्रूरता और कमलाप्रसाद के मानसिक शोषण का सामना करती है। तमाम अभावों और अकेलेपन के बावजूद वह अपने आत्मसम्मान को नहीं खोती और कमलाप्रसाद के प्रलोभनों को ठुकरा देती है।
- इस पात्र ने मुझे कैसे प्रभावित किया: पूर्णा का चरित्र आज की उन हज़ारों विधवा, तलाकशुदा या सिंगल मदर महिलाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो समाज के तानों और पुरुषों की विकृत नज़रों के बीच रोज़ जीती हैं। उसने मुझे यह अहसास कराया कि एक अकेली महिला कितनी मानसिक पीड़ा से गुज़रती है। जब कोई महिला संकट में होती है, तो वह बहुत भावुक और कमज़ोर होती है; ऐसे समय में उसका फायदा उठाना सबसे बड़ा पाप है। पूर्णा के संघर्ष ने मुझे सिखाया कि एक सच्चे पुरुष का कर्तव्य ऐसी महिला की गरिमा और आत्मसम्मान की रक्षा करना है, न कि उसे अपनी शर्तों पर झुकाना।
४. दाननाथ: समाज के डर से समझौते करने वाला आम आदमी
दाननाथ पहले अमृतराय का पक्का दोस्त और उनके विचारों का समर्थक होता है। लेकिन जैसे ही समाज का दबाव बढ़ता है और परिस्थितियाँ बदलती हैं, वह अपने कदम पीछे खींच लेता है और अपने मित्र का ही विरोधी बन जाता है।
- इस पात्र ने मुझे कैसे प्रभावित किया: दाननाथ के चरित्र ने मुझे समाज के एक बहुत बड़े कड़वे सच से रूबरू कराया। हमारे आस-पास ऐसे बहुत से लोग हैं जो निजी बातचीत में तो बड़ी प्रगतिशील बातें करते हैं, लेकिन जब समाज के सामने स्टैंड (Stand) लेने की बात आती है, तो वे डरकर रूढ़ियों के आगे घुटने टेक देते हैं। दाननाथ ने मुझे सिखाया कि जो व्यक्ति मुश्किल समय में समाज के डर से आपका साथ छोड़ दे, वह सबसे खतरनाक होता है। यह चरित्र मुझे अपने फैसलों में दृढ़ और संकट के समय अपनों के प्रति वफ़ादार रहना सिखाता है।
५. प्रेमा और सुधा: भारतीय नारी की समझदारी और त्याग
प्रेमा और सुधा जैसी महिला पात्र उपन्यास में उस समझदारी, सहनशीलता और सेवाभाव को दर्शाती हैं जो भारतीय समाज की असली ताकत हैं। वे विपरीत परिस्थितियों में भी अपने नैतिक मूल्यों का साथ नहीं छोड़तीं।
- इन पात्रों ने मुझे कैसे प्रभावित किया: इन चरित्रों ने मुझे यह समझने में मदद की कि महिलाएँ पुरुषों की तुलना में कितनी अधिक मानसिक परिपक्वता और गरिमा रखती हैं। वे पुरुषों की बनाई सामाजिक विकृतियों को सहती भी हैं और मर्यादाओं को जोड़े रखने का काम भी करती हैं। इनसे मैंने सीखा कि महिलाओं की आंतरिक शक्ति का हमेशा सम्मान किया जाना चाहिए।
आज इस उपन्यास को पढ़ना क्यों ज़रूरी है?
मेरी नज़र में, 'प्रतिज्ञा' केवल एक बीते हुए दौर की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे आज के समाज का एक कड़वा आईना है। लोगों को, विशेषकर आज के युवाओं और पुरुषों को यह उपन्यास ज़रूर पढ़ना या सुनना चाहिए, ताकि वे तीन बुनियादी बातें समझ सकें:
- सच्ची मदद और शोषण का अंतर: किसी मजबूर व्यक्ति को उसके कानूनी और सामाजिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना, उसे आत्मनिर्भर बनाना सच्ची इंसानियत है। इसके विपरीत, उसकी मजबूरी का फायदा उठाकर उसे भावनात्मक रूप से अपने ऊपर निर्भर बना लेना 'कमलाप्रसाद' का पाखंड है।
- सहमति और सम्मान की अहमियत: प्रेम या कोई भी रिश्ता केवल तभी पवित्र है जब उसमें सामने वाले की स्वतंत्र इच्छा, आपसी सहमति (Consent) और अटूट सम्मान हो, न कि उसकी लाचारी का फायदा उठाकर बुना गया कोई जाल।
- नैतिकता का आत्म-मूल्यांकन: यह किताब हमें हर दिन खुद के भीतर झांकने पर मजबूर करती है कि जब हम किसी अकेली महिला के दोस्त या मददगार बनकर खड़े होते हैं, तो हमारी सीमाओं (Boundaries) और नीयत में कितनी ईमानदारी है।
निष्कर्ष
प्रेमचंद की प्रतिज्ञा हमें सिखाती है कि समाज तब तक आधुनिक नहीं हो सकता, जब तक हम अपनी मानसिकता को स्वार्थ और पाखंड से आज़ाद नहीं कर लेते। जब तक एक अकेली महिला बिना किसी डर, शोषण या सामाजिक लांछन के इस समाज में गरिमा के साथ सिर उठाकर नहीं जी सकती, तब तक हमारी हर प्रगतिशीलता केवल एक खोखला दिखावा है।
प्रेमचंद की प्रतिज्ञा हमें सिखाती है कि समाज तब तक आधुनिक नहीं हो सकता, जब तक हम अपनी मानसिकता को स्वार्थ और पाखंड से आज़ाद नहीं कर लेते। जब तक एक अकेली महिला बिना किसी डर, शोषण या सामाजिक लांछन के इस समाज में गरिमा के साथ सिर उठाकर नहीं जी सकती, तब तक हमारी हर प्रगतिशीलता केवल एक खोखला दिखावा है।
Govind
August 20, 2026
Mumbai

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